जिस ‘भारत भवन’ में मजदूरी की, उसी की मुख्य अतिथि बनीं पद्मश्री भूरीबाई

मध्य प्रदेश की आदिवासी चित्रकार भूरी देवी को ‘भारत भवन’ के स्थापना दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। दिलचस्प बात ये है कि जब इस भवन का निर्माण शुरू हुआ था, तब वो 6 रुपए प्रतिदिन की दिहाड़ी पर बतौर मजदूर यहाँ काम करती थीं। उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी कि इसी ‘भारत भवन’ में वो मुख्य अतिथि बनेंगी। पद्मश्री से सम्मानित भूरीबाई देवी पिथोरा पेंटिंग कला में सिद्धहस्त हैं।

भोपाल के ‘भारत भवन’ को बहुकला केंद्र के रूप में जाना जाता है। इसके निर्माण के समय वो ईंट-पत्थर ढोने का काम किया करती थीं। ‘भारत भवन’ के पहले प्रमुख रहे जे स्वामीनाथन ने उनकी कला को पहचाना था और उन्हें आगे बढ़ाया। फ़रवरी 13, 2021 को 39वाँ स्थापना दिवस समारोह मनाया गया। भूरीबाई बताती हैं कि 40 वर्ष पहले वो मजदूर के रूप में यहाँ काम करती थीं, जो उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

जब वो यहाँ काम करती थीं, तब उन्हें पता भी नहीं था कि वो जिस भवन के निर्माण में योगदान दे रही हैं, वो कला केंद्र बनने वाला है। वो इसे सिर्फ एक इमारत समझ कर काम करने आई थीं। वो अपना घर चलाने के लिए ईंट-पत्थर ढो रही थीं, लेकिन फिर यहीं से जुड़ गईं। उन्होंने मुख्य अतिथि बनने को भावुक क्षण बताते हुए कहा कि यहीं उन्हें अपनी कला को निखारने का मंच मिला और उन्हें नए मौके मिले।

आदिवासी भील समुदाय की भूरीबाई ने बताया कि जब वो मजदूरी करती थीं तो एक दिन वो अन्य महिला मजदूरों के साथ भोजन करने जा रही थीं। तभी जे स्वामीनाथन आए और पूछा कि क्या वो अपनी संस्कृति की शादी की चित्रण बना सकती हैं? उन्होंने हामी भर दी लेकिन साथ ही पूछा कि मजदूरी का क्या होगा और रुपए नहीं मिलेंगे तो घर कैसे चलेगा? इस पर उन्हें बताया गया कि इसके लिए 150 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से धनराशि मिलेगी। भूरीबाई ने 10 दिन काम किया और 1500 रुपए लेकर घर गईं।

‘दैनिक जागरण’ में सुशील पांडेय की खबर के अनुसार, झाबुआ के एक गाँव में चित्रकारी सीखने वाली भूरीबाई के पास जब इतने रुपए उनके पति ने देखा तो पूछा कि कहीं उन्होंने कुछ गलत कार्य तो नहीं किया? उन्हें समाज में लांछन का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने परिवार, पति और खेती-बारी सबका ख्याल रखते हुए चित्रकारी जारी रखी। श्यामला पहाड़ी पर बने ‘भारत भवन’ की स्थापना 1982 में हुई थी।

बता दें कि मोदी सरकार में सांस्कृतिक स्तर के काम करने वाले ऐसे कई लोगों को पद्म पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। इस वर्ष भी कुल 119 नामों की इस सूची में कई ऐसे नाम हैं, जिनके संघर्ष की कहानी लंबी है। इनमें लौंडा नाच के नाम पर समाज में एक गायब होती परंपरा को जीवनदान देने वाले रामचंद्र माँझी और डायन जैसी कुरीति की भुक्तभोगी होने के बाद उसके ख़िलाफ लंबी लड़ाई लड़ने वाली छूटनी देवी जैसे नाम शामिल हैं।

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